संकट चौथ (सकट चौथ) व्रत कथा

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प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र थे, परंतु दुर्भाग्यवश सातों पुत्रों की मृत्यु हो गई। इस कारण साहूकार की पत्नी अत्यंत दुःखी रहती थी। उसने अपने दुख से मुक्ति और पुत्र प्राप्ति की कामना से सकट चौथ का व्रत पूरे विधि-विधान से करना आरंभ किया।

हर वर्ष माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को वह दिनभर उपवास रखती, संध्या समय चंद्रमा को अर्घ्य देती और भगवान श्री गणेश जी तथा माता सकट की पूजा करती। उसने यह व्रत पूरे श्रद्धा और नियम से किया।

माता सकट उसकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उसे आशीर्वाद दिया कि अगले जन्म में उसके सात पुत्र होंगे और वे दीर्घायु होंगे। माता के वरदान से साहूकार की पत्नी का दुख समाप्त हुआ।

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव के पुत्र श्री गणेश जी पृथ्वी पर भ्रमण के लिए आए। उन्होंने देखा कि एक स्त्री सकट चौथ का व्रत कर रही है। उसकी श्रद्धा देखकर गणेश जी अत्यंत प्रसन्न हुए और उसके घर में सुख-समृद्धि, पुत्र सुख और कष्टों के नाश का वरदान दिया।

तभी से यह विश्वास किया जाता है कि सकट चौथ का व्रत करने से संतान की रक्षा होती है, घर के संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।

🌙 व्रत का महत्व

  • संतान की लंबी आयु के लिए
  • घर-परिवार के कष्ट दूर करने हेतु
  • गणेश जी की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए

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